सुबह हुई नहीं.. के रास्ते चल पड़े..
रात भर जागने वाले दिए.. अपने घर को मुड़े..
मौसम का एहसास है ज़रा नमकीन सा..
और लहरे फेकता समुन्दर हसीं सा..
बादल.. हवाए..ऊंचे घरो के साये..
धुप है यहापे.. कही और क्यों जाये..
पटरियों पे भागती.. है जिंदगी..
कभी तेज़ गति से.. कभी धीमी..
पर पहोंचे मंजिल को वक़्त पे..
चाहे हो..दुनिया थमी..
है थोडीसी मुश्किलें..
और थोड़े गम भी मिल..जाये..
पर चैन है यहाँ..पे..कहीं और क्यों जाये..
सजते कई सपने यहाँ पे.. फिर भी कम है..
बह गए सारे आंसू.. आँखे फिर भी नम है..
जख्मो को चीरके...एक आवाज निकलती है..
हौसला खोना नहीं..तेरे संग हम है...
तनहाई में.. बरसती..बारिशों की बूंदे..
साथ में गीली मिटटी की खुशबू मिल जाये..
यहाँ जीने के बहाने है..कही और क्यों जाये..!!!
Thursday, May 13, 2010
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