Thursday, January 28, 2010

sOme blue thoughts



















कैसे
कोई खयाल..पंछी बनके ऊड गया
पता ही चला

कैसे कोई रास्ता मंजिल को मूड़ गया
पता ही चला...
खो गया..हूँ धडकनों की आवाजो में
और मुजे पता ही चला..

अब जाके ख़त्म होगा इंतज़ार
होश नहीं मुजको..
में हूँ खाव्बो के पार

ज़िन्दगी ने छोड़े..कुछ निशाँ धडकनों के
राहे भी चल रहा..आसमा..संग मेरे
कोई पत्ता चला था होके सवार उस हवा पे
पूछ लिया पता मैंने मंजिल का मेरे..
जाते जाते वोह दे गया अजनबी बहार..

अब जाके ख़त्म होगा इंतज़ार
होश नहीं मुजको..
में हूँ खाव्बो के पार

चलने की आस कदमो को थी..
मन मेरा उड़ रहा था कही..
जाके टकराया वोह सुरजसे..
और मुर्ज़ाके..शाम हो गयी..
बस अब रात..भी गुजरने को है तयार..

अब जाके ख़त्म होगा इंतज़ार
होश नहीं मुजको..
में हूँ खाव्बो के पार

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